रेड लाइट एरिया का कड़वा सच: जिस्मफरोशी, मानव तस्करी और जबरदस्ती सेक्स | गीतांजलि बब्बर | राज शमानी

यह पॉडकास्ट गीतांजलि बब्बर के साथ है, जो 'कतकथा' फाउंडेशन की फाउंडर हैं। यह संस्था दिल्ली के रेड लाइट एरिया में रहने और काम करने वाली महिलाओं की मदद करती है। गीतांजलि सालों से इन महिलाओं के बीच काम कर रही हैं और उनकी अनसुनी आवाजों को दुनिया तक पहुंचा रही हैं। इस बातचीत में वे रेड लाइट एरिया की उन सच्चाइयों को सामने लाती हैं जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन जिन्हें समझना बहुत ज़रूरी है।

हम जानेंगे कि कैसे लड़कियां इन जगहों पर फंस जाती हैं, उन्हें वहां से निकालना इतना मुश्किल क्यों होता है, और क्या सेक्स वर्क को कानूनी बनाना इस समस्या का हल है? गीतांजलि चाइल्ड ट्रैफिकिंग, सेक्स एक्सप्लॉयटेशन और रेप जैसी भयानक सच्चाइयों पर बात करती हैं। वे बताती हैं कि कैसे समाज इन महिलाओं और उनके बच्चों को देखता है, और क्यों ये महिलाएं कभी-कभी अपनी ज़िंदगी से इतनी निराश हो जाती हैं कि उन्हें लगता है कि उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा है।

रेड लाइट एरिया की असलियत

गीतांजलि बताती हैं कि रेड लाइट एरिया की सच्चाई फिल्मों में दिखाए जाने वाले ग्लैमर से बहुत अलग है। यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ छोटी उम्र की लड़कियों को भी जबरदस्ती धंधे में धकेला जाता है। उन्हें मारा-पीटा जाता है, नशे में रखा जाता है और दिन भर में 30-40 या उससे भी ज़्यादा क्लाइंट्स अटेंड करने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में उनका शरीर एक 'डेड बॉडी' जैसा हो जाता है। वे बताती हैं कि कैसे इन महिलाओं को पेट भरने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, और अगर वे क्लाइंट अटेंड नहीं करतीं तो उन्हें खाना भी नहीं मिलता।

मुख्य बातें

  • जबरदस्ती और मजबूरी: ज़्यादातर महिलाएं अपनी मर्ज़ी से इस काम में नहीं आतीं, बल्कि उन्हें मजबूर किया जाता है, मारा-पीटा जाता है और नशे में धकेल दिया जाता है।
  • सिस्टम की खामियां: पुलिस और सिस्टम का एक बड़ा हिस्सा इस गोरखधंधे में शामिल है, जिससे इन महिलाओं को बचाना और भी मुश्किल हो जाता है।
  • बच्चों पर असर: इन महिलाओं के बच्चों को समाज और स्कूलों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका भविष्य भी अंधकारमय हो जाता है।
  • मानसिक आघात: इन महिलाओं को भयानक मानसिक और शारीरिक आघात से गुजरना पड़ता है, जिससे उनका दिमाग पूरी तरह से ट्रॉमाटाइज हो जाता है।
  • कानूनी पहलू: सेक्स वर्क को लीगल करने के सवाल पर गीतांजलि का मानना है कि इससे समस्या का हल नहीं होगा, बल्कि यह और बढ़ सकती है क्योंकि सिस्टम में भ्रष्टाचार बहुत ज़्यादा है।
  • समाज की भूमिका: समाज इन सच्चाइयों को जानते हुए भी अनदेखा करता है, और कई लोग यह मानने को तैयार नहीं होते कि ये महिलाएं मजबूरी में यह काम कर रही हैं।

कैसे फंसती हैं लड़कियां?

गीतांजलि बताती हैं कि लड़कियों के फंसने की कोई एक कहानी नहीं है, हर किसी की कहानी अलग है। कुछ लड़कियां तो कोठों में ही पैदा होती हैं और वहीं बड़ी होती हैं, उनके लिए यही दुनिया होती है। कुछ को उनके परिवार वाले, खासकर राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे इलाकों से, बहला-फुसलाकर या मजबूरी में इस धंधे में ले आते हैं। उन्हें झूठे वादे किए जाते हैं कि उन्हें अच्छे कपड़े मिलेंगे, घूमने का मौका मिलेगा, लेकिन असलियत बहुत कड़वी होती है। 10-12 साल की छोटी बच्चियों को भी इस दलदल में धकेला जाता है।

क्यों नहीं निकल पातीं?

इन जगहों से निकलना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि:

  • मानसिक गुलामी: सालों के टॉर्चर और शोषण के कारण उनका दिमाग इतना ट्रॉमाटाइज हो जाता है कि वे खुद को गुलाम समझने लगती हैं और सोचने की शक्ति खो देती हैं।
  • डर और धमकी: अगर वे भागने की कोशिश करती हैं, तो उन्हें मारा-पीटा जाता है, और कई बार तो जान से भी मार दिया जाता है।
  • सिस्टम का साथ न देना: पुलिस अक्सर मदद करने की बजाय दलालों और कोठा मालिकों के साथ मिली होती है। अगर कोई महिला पुलिस के पास जाती भी है, तो उसे ही दोषी ठहराया जाता है।
  • सामाजिक बहिष्कार: अगर वे किसी तरह बाहर निकल भी आती हैं, तो समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता। उनके बच्चों को स्कूल में एडमिशन नहीं मिलता, और उन्हें कहीं भी सम्मान नहीं मिलता।

समाज की अनदेखी और मानसिकता

गीतांजलि इस बात पर जोर देती हैं कि समाज इन सच्चाइयों को जानते हुए भी जानबूझकर अनदेखा करता है। लोग यह मानने को तैयार नहीं होते कि ये महिलाएं मजबूरी में यह काम कर रही हैं। वे कहती हैं, "हम बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की बात करते हैं, लेकिन वहीं बेटियां रोज़ बिक रही हैं और हम खरीद रहे हैं।" वे बताती हैं कि कैसे स्कूल एडमिशन के लिए दरवाजे खटखटाने पर भी उन्हें बच्चों के पेरेंट्स की वजह से मना कर दिया जाता है। यह दिखाता है कि समाज कितना खोखला हो गया है, जहाँ हम सिर्फ दिखावे की प्रगति और विकास की बात करते हैं, लेकिन असलियत में बहुत पीछे हैं।

समाधान की ओर

गीतांजलि का मानना है कि इस समस्या का हल सिर्फ कानून बनाने या रेड मारने से नहीं होगा। इसके लिए समाज की मानसिकता में बदलाव लाना ज़रूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि ये महिलाएं भी इंसान हैं और उन्हें भी सम्मान और जीने का अधिकार है। 'कतकथा' जैसी संस्थाएं इन महिलाओं को न सिर्फ कानूनी मदद देती हैं, बल्कि उन्हें शिक्षा और रोज़गार के अवसर भी प्रदान करती हैं ताकि वे एक बेहतर जीवन जी सकें। यह एक लंबी लड़ाई है, लेकिन जागरूकता और समाज के सहयोग से ही इसमें बदलाव लाया जा सकता है।